Tuesday, February 12, 2019

इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने बनाया स्मार्ट फ़ोन का डिजाईन , पॉप अप कैमरा घूमेगा 360 डिग्री

स्टूडेंट ताराकांत और क्षितिज ने डेवलप की मोबाइल की डिजाईन , कराया  पेटेंट का कॉपीराइट

अपने स्मार्ट फ़ोन में उपरी हिस्से पर कैमरा तो देखा होगा , लेकिन स्मार्ट फ़ोन मे हिडन  कैमरे के साथ पॉप अप कैमरा मिले  तो यह एडवांस टेक्नोलॉजी हर किसी को पसंद आएगी | मोबाइल में पॉप अप कैमरा है , इसमें दिए गए बटन को प्रेस करने पर ओपन हो जायेगा और 360 डिग्री तक आसानी से घूम सकेगा | ऐसे मोबाइल फ़ोन की डिजाईन तैयार की शहर के एक निजी कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले स्टूडेंट ताराकांत और क्षितिज ने | इन स्टूडेंट का सहयोग उनके टीचर डॉक्टर विकास परे ने भी किया ये दोनों स्टूडेंट इस मोबाइल के डिजाईन के पेटेंट कॉपीराइट अपने नाम कराया है | उन्होंने बताया है की इस काम के लिए उन्हें एक साल का समय  लगा है |

ज्यादा भार वाली जगह पर दी मेटल बॉडी - 
                                                                  डॉक्टर विकास पारे ने बताया की मोबाइल फ़ोन की डिजाईन दी शेप में है , जो अपने आप में नई है साथ ही इसकी डिजाईन में सीजी तकनीक यानि सेण्टर ऑफ़ ग्रेविटी का ध्यान रखा गया है | मोबाइल फ़ोन जिस तरफ ज्यादा भारी होगा वहां मेटल बॉडी दी गई है |

Saturday, January 19, 2019

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है जमाना (2019)

अब आने वाले दिनों में मशीने जरुरत से ज्यादा समझदार हो जाएंगी |आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से वे आपको उपयोगी सुझाव देंगी | युवाओ के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक नया कैरियर विकल्प है | जानते हैं की आप इस फील्ड में कैसे सफल हो सकते हैं -
                                                                     आज के समय में टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से बदल रही है और इंसानों की जगह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लेती जा रही है | देखा जाये तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने वाले वक्त की टेक्नो - फ्यूल साबित होगी जो विज्ञानं को हमारे सोचने की सीमओं से परे ले जाएगी | किसी चिप पर इलेक्ट्रॉनिक ब्लड के रूप में दौड़ती आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ही निर्धारित करेगी की मानव का भविष्य क्या होगा ? जानिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुडी खास बातो के बारे में और इसमें कैरियर कैसे बनाये जाएँ -

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का चमत्कार
(1) आप ने देखा होगा की जब आप गूगल में सर्च करने के लिए कुछ लिखने लगते हैं तो गूगल अपने आप उसकी पूरी स्पेलिंग सजेशन में दिखाने लगता है |
(2) आप उबर या ओला कैब बुक करते हैं और फ़ोन का एप्प आपको गंतव्य स्थान तक पहुचाने का छोटे से छोटा रास्ता बताने लगता है |
(3) इसी तरह गूगल असिस्टेंट , एप्पल सिरी या अमेजन की अलेक्सा भी करती हैं | ये आपका हर आर्डर मानती हैं |
                                                             ये सभी डिवाइस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ही चमत्कार है |

क्या है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस -
वास्तव में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बुद्धिमता न होकर डाटा का मैनेजमेंट और खास मेथेमेटिक है | इंजीनियरिंग की कई ब्रांच जैसे - कंप्यूटर इंजिनियर , सॉफ्टवेयर इंजिनियर, रोबोटिक्स , इलेक्ट्रिकल , इलेक्ट्रॉनिक, आदि को एक जगह मिलाकर इलेक्ट्रिकल , इलेक्ट्रॉनिक,  का निर्माण किया जाता है | सरल भाषा में आप एक मशीन ( कंप्यूटर ,रोबोट या चिप ) बनाते हैं , उस मशीन में किसी खास टास्क से सम्बंधित दुनिया भर का डाटा फीड करते है और एक सॉफ्टवेयर तैयार करते हैं जो उपलब्ध डाटा के आधार पर परिस्तिथियों का सही आकलन कर सके | फिर इसी आकलन के आधार पर क्या करना ठीक रहेगा , इसका अंदाजा लगाकर बिलकुल सही एक्शन ले | इस प्रोसेस को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  कहते हैं |

ऐसे करे शुरुआत
 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  में कैरियर बनाने में दो चीजें जरुरी हैं - कंप्यूटर साइंस तथा मेथेमेटिक्स  || अगर इनमे से किसी एक में भी महारत हासिल है तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  में टॉप लेवल पर पहुच सकते हैं |
आपके पास इंजीनियरिंग डिग्री होना जरुरी है  यह डिग्री कंप्यूटर साइंस , सॉफ्टवेर टेक्नोलॉजी , गणित , इलेक्ट्रॉनिक , इलेक्ट्रिकल जैसे सब्जेक्ट में होना चाहिए

ऑनलाइन कोर्सेज - 
दुनिया की लगभग सभी टॉप यूनिवर्सिटी तथा इंस्टीट्यूट युवाओ के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  के ऑनलाइन कोर्सेज चला रहे हैं | ऑनलाइन स्टडी प्लेटफार्म edX व Coursera पर जाकर एम आई टी , यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सोस के कोर्सेज ज्वाइन कर सकते हैं | इस समय के बेस्ट ऑनलाइन कोर्सेज ये हैं -
(1) गूगल - मशीन लर्निग
(2) स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी - मशीन लर्निग
(3) कोलंबिया यूनिवर्सिटी - मशीन लर्निग 

Monday, April 9, 2018

Monday, April 2, 2018

कंप्यूटर की पीढियां


                                                         कंप्यूटर पीढियां

                       (Generation of computer)

अबेकस से शुरू हुई कंप्यूटर की विकास यात्रा कई चरणों से गुजरते हुए वर्तमान डिजिटल कंप्यूटर तक पहुची. 1946 में विकसित ENIAC (Electronic Integrator Integratior and Calculator)  को प्रथम इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर कहा जा सकता है. इसके बाद EDVAC , EDSAC आदि Vacuum Tube पर आधारित कंप्यूटर आये. इसके बाद ट्रांजिस्टर इंटीग्रेटेड सर्किट , LSI , VLSI , सर्किट पर आधारित कंप्यूटर विकसित होते गए. समय के साथ - साथ कंप्यूटर की प्रोसेसिंग एवं संग्रहण क्षमता में वृद्धि होती गई तथा आकार एवं कीमतों में कमी होती गई. 1950 तक कंप्यूटर का उपयोग सेना , इंजीनियरिंग एवं विज्ञानं के क्षेत्रो तक ही सीमित था. 1950 के बाद इसका व्यावसायिक क्षेत्रो में उपयोग होना शुरू हुआ तथा 1995 के बाद तो इसका उपयोग घरेलु कार्यों तक में होने लगा है. कंप्यूटर के इसी विकास क्रम को अग्रलिखित पाच {5} पीढ़ियों के अंतर्गत वर्णित किया गया है



{1} प्रथम पीढ़ी (First Generation 1947-1959)

                       1946 में जे.पी. एकर्ट (J.P. Ecert) एवं जॉन मुचली (John Mauchly) द्वारा प्रथम इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर ENIAC (Electronic Integrator Integratior and Calculator) का अविष्कार पेनिसिलवेनिया विश्वविद्यालय की मूर स्कूल ऑफ़ इंजीनियरिंग में किया गया. इसका विकास मुख्यतः रक्षा कार्यों हेतु किया गया था. इसमें 18,000 वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tube) का उपयोग किया गया था. यह दो संख्याओ को 200 माइक्रोसैकेण्ड में जोड़ता था तथा 2000 माइक्रोसैकेण्ड में गुणा करता था. यह लगभग 150 वर्गमीटर क्षेत्र घेरता था.

1945 में वोन न्यूमैन (Von Newmen) ने स्टोर्ड प्रोग्राम कंप्यूटर (Stored Program Computer) का विकास किया. इसमें डाटा के साथ निर्देश भी स्टोर होते थे जिससे स्वचालित क्रियाएं हो सके. इसे EDVAC (Electronic Discrete Variable Automatic Computer)  कहा जाता है. इसमें सर्वप्रथम बाइनरी का प्रयोग हुआ इसी विचारधारा के आधार पर ब्रिटेन के महाविद्यालय के मोरिस विल्कस (Marris Wilkes) ने EDSAC (Electronic Storage Automatic Calculator) का विकास किया. इसमें जोड़ 1500 माइक्रोसैकेण्ड में व गुणा 4000 माइक्रोसैकेण्ड में होता था. 1950 में रेमिंगटन रेंड कंपनी द्वारा UNIVAC-1 का विकास किया गया. इसमें वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tube) का उपयोग होने के कारण बिजली आधिक खपत होती थी व ट्यूब मे उपयोग होने वाले ‍फिलामेन्ट की आयु काफी कम होती थी. इसमें कार्यक्रम मशीन द्वारा (0-1)में लेखे जाते थे .

मुख्य विशेषता प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटर की मुख्य विशेषता निम्नलिखित थी

(1)    अत्यधिक खर्चीली प्रणाली

(2)    अधिक विशाल आकार

(3)    धीमी गति

(4)    मुख्य स्विचिंग डिवाइस वैक्यूम ट्यूब

(5)    संग्रहण डिवाइस मैग्नेटिक ड्रम

(6)    प्रोग्रामिंग भाषाएँ मशीनी भाषा असेम्बली भाषा



(2) द्वितीयक पीढ़ी (Second Generation 1959-1965)

                        1947 में अमेरिका की बेल लेबोरेट्री में कार्यरत जॉन बारडीन (John Bardeen), वाल्टर ब्रेटेन (Walter Brattian) एवं विलियम शाकले (William Shockley) द्वारा ट्रांजिस्टर का विकास किया गया. वैक्यूम ट्यूब में फिलामेन्ट का उपयोग होता था जिसका जीवनकाल काफी छोटा होता था जबकि ट्रांजिस्टर में जर्मेनियम सेमीकंडक्टर (Germanium Semiconductor) का उपयोग होता है जो की काफी कम स्थान व बिजली का उपयोग करता है. इन कंप्यूटर में प्रिंटेड सर्किट का उपयोग किया गया था. ICT 1300 व IBM 1401 इसके प्रमुख उदाहरण हैं इन कंप्यूटर में लगभग 10,000 ट्रांजिस्टर का उपयोग होता था.

इसी काल में डाटा स्टोरेज हेतु मेग्नेटिक कोर का अविष्कार हुआ. मेग्नेटिक कोर फेराईट की बनी हुई छोटी छोटी रिंग्स होती है जो चुम्ब्कीकृत होती है. मेग्नेटिक डिस्क का अविष्कार भी इसी चरण में हुआ. इस प्रकार इस युग के कंप्यूटर अधिक शीघ्र परिणाम देने वाले तथा प्रथम चरण के कंप्यूटर की अपेक्षा अधिक मेमोरी क्षमता वाले थे. इसी चरण में उच्च स्तरीय भाषाओं जैसे FORTRAN, COBOL, ALGOL आदि का विकास हुआ. इस चरण में व्यावसायिक एवं उद्योग के क्षेत्र में कंप्यूटरों के उपयोग में काफी वृद्धि हुई. IBM605 इसका उदाहरण है.    



मुख्य विशेषता द्वितीय पीढ़ी के कंप्यूटर की मुख्य विशेषता निम्नलिखित थी

(1) छोटा आकार 

(2) शीघ्र गणन कार्य  

(3)   अधिक वाणिज्यिक उपयोग

(4)  मुख्य स्विचिंग डिवाइस ट्रांजिस्टर

(5)  संग्रहण डिवाइस मैग्नेटिक कोर मेमोरी , मेग्नेटिक टेप एवं मेग्नेटिक डिस्क

(6)  प्रोग्रामिंग भाषाएँ उच्च स्तरीय भाषाएँ जैसे BASIC, COBOL एवं FORTRAN आदि



(3) तृतीय पीढ़ी (Third Generation 1965-1975)

                        इस चरण में इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuits [IC] का अविष्कार हुआ. इसमें एक चिप पर हजारों की संख्या में ट्रांजिस्टर, रजिस्टर , केपेसिटर को स्थित किया जा सकता है इससे कंप्यूटर का आकार काफी छोटा हो गया तथा सर्किट की स्विचिंग गति काफी बढ़ गई जिससे शक्तिशाली सी.पी.यू. (CPU) का निर्माण होने लगा जो की प्रति सेकंड 10 लाख निर्देशों का पालन कर सकते हैं. इससे नेनो सेकंड जो की माइक्रोसैकेण्ड का एक हजारवा भाग है में कार्य होने लगा. IBM-360, ICL-1900 जैसे प्रमुख कंप्यूटर इस चरण में विकसित हुए. कंप्यूटर का छोटा होने के कारण इसकी पोर्टेबिलिटी बढ़ गई.

इसी चरण में विभिन्न प्रकार के इनपुट आउटपुट उपकरणों का विकास हुआ. Optical, Scanner, MICR , Graph plotters आदि का विकास इसी चरण में हुआ. कंप्यूटर का उपयोग नवीन क्षेत्रों जैसे उत्पाद किस्म , ग्राहक सेवा , वायुयान आरक्षण आदि में होने लगा. इस चरण में उच्च स्तरीय भाषाओं में और सुधार हुआ. इसी चरण में प्रथम मिनी कंप्यूटर का आविर्भाव हुआ -



मुख्य विशेषता तृतीय पीढ़ी के कंप्यूटर की मुख्य विशेषता निम्नलिखित थी

(1)   काफी छोटा आकार 

(2)  रख रखाव खर्च में कमी 

(3)  वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ

(4) मुख्य स्विचिंग डिवाइस   इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuits [IC]

(5) संग्रहण डिवाइस उच्च स्तरीय मेग्नेटिक कोर

(6) प्रोग्रामिंग भाषाएँ SB-PL\1 , COBOL 68 FORTRAN IV आदि



(4) चतुर्थ पीढ़ी (Fourth Generation 1976-1990)

                           इस चरण में कंप्यूटर में माइक्रोप्रोसेसर चिप का उपयोग होने लगा. ऐसा लार्ज स्केल इंटीग्रेशन (LSI) चिप्स के उद्गम से संभव हुआ. वर्तमान में LSI चिप्स कंप्यूटर के दिमाक के रूप में कार्य करती है. इससे काफी छोटे एवं शक्तिशाली कंप्यूटर का विकास संभव हुआ एवं कंप्यूटर की लागतो में काफी कमी हुई डिस्क मेमोरी की क्षमता मेगाबाइट की जगह गीगाबाइट (GB) में आने लगी है. फ्लॉपी डिस्क ने स्टोरेज को काफी सस्ता बना दिया तथा कंप्यूटर नेटवर्क का विकास हुआ. कंप्यूटर का उपयोग चिकित्सा , इंजीनियरिंग , डिजाईन आदि क्षेत्रो में काफी अधिकता से होने लगा है. ADA , Pascal , C आदि प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास इसी चरण में हुआ.



मुख्य विशेषता चतुर्थ पीढ़ी के कंप्यूटर की मुख्य विशेषता निम्नलिखित थी



(1)    अत्यधिक छोटा आकार

(2)    आसन पोर्टेबिलिटी

(3)    अत्यधिक सस्ते उपकरण

(4)    तीव्र प्रोसेसिंग

(5) मुख्य स्विचिंग डिवाइस   LSI सर्किट

(6) संग्रहण डिवाइस सेमीकंडक्टर मेमोरी 

(7) प्रोग्रामिंग भाषाएँ उच्च स्तरीय भाषाओ जैसे C , Pascal , ADA आदि का उपयोग.

(8) एयर कंडीशन की आवश्कता नही





(5)    पंचम पीढ़ी (Fifth Generation 1990 Onward)

                        वर्तमान में वैज्ञानिको का प्रयास कंप्यूटर के कुछ मात्रा तक कृत्रिम बुद्धि डालना है जिससे कंप्यूटर केवल मानवीय निर्देशो पर ही निर्भर नही रहे. इस चरण में क्रमागत ढांचे (Serial Structure) की अपेक्षा समान्तर ढांचे (Parallel Structure) पर अधिक बल दिया जा रहा है. इसका उद्देश्य कंप्यूटर के उपयोग को डाटा प्रोसेसिंग से नॉलेज प्रोसेसिंग की तरफ ले जाना है. जापान में विकसित प्रोलोग लैंग्वेज कंप्यूटर को मानवीय भाषा समझने की ओर अग्रसर कर रही है. अमेरिका में माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन इस दिसा में काफी कार्य कर रही है.



मुख्य विशेषता पंचम पीढ़ी के कंप्यूटर की मुख्य विशेषता निम्नलिखित थी



(1) 32- बिट एवं 64- बिट का उपयोग

(2) नेटवर्किंग का उपयोग

(3) अत्यधिक तीव्र प्रोसेसिंग

(4) मुख्य स्विचिंग डिवाइस   VLSI सर्किट 

(6) संग्रहण डिवाइस ऑप्टिकल मेमोरी 

(7) प्रोग्रामिंग भाषाएँ अप्रक्रियागत भाषाओं जैसे Java, C++ आदि का विकास.
Govt. Polytechnic College Chhindwara (M.P)                                              

Saturday, March 31, 2018

कंप्यूटर में बूटिंग प्रक्रिया क्या होती है ?



                                बूटिंग प्रक्रिया
कंप्यूटर के स्टार्ट (start) होने की प्रक्रिया बूटिंग कहलाती है. ऑपरेटिंग सिस्टम डॉस साधारणतः एक डिस्क पर स्टोर रहता है, जो की हार्ड डिस्क या फ्लॉपी डिस्क हो सकती है. यदि आपके पास हार्ड डिस्क मशीन है तो उसमे एक ही बार ऑपरेटिंग सिस्टम डलवा लिया जाता है, इससे आपको कंप्यूटर को बूट कराने के लिए ऑपरेटिंग डिस्क नही लगानी पड़ेगी.
                               यदि हमारे पास हार्ड डिस्क नही है, तो कंप्यूटर को चलाने के लिए हर बार हमें ऑपरेटिंग डिस्क लगानी पड़ेगी. यदि आपके पास दो ड्राइव (drive) है तो आपको ऑपरेटिंग सिस्टम को A में लोड करना होगा. जो डिस्क ड्राइव ऑपरेटिंग सिस्टम को लोड करने के लिए प्रयोग की जाती है, उसे डिफॉल्ट ड्राइव (Default drive) कहते हैं.
                              यदि आपका कंप्यूटर किसी कारणवश रुक जाता है तो आप इसे रीस्टार्ट (Restart) कर सकते हैं लेकिन थोड़ी सी समस्या आते ही कंप्यूटर को रीबूट या रीस्टार्ट करना उचित नही है इससे उस समय आप जिस प्रोग्राम में काम कर रहे हैं. उसका डाटा ख़राब (Damage) हो सकता है. इसलिए रीबूटिंग केवल तभी की जनि चाहिए, जब आपके पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प (Alternate) न रहे.

REBOOTING
यदि आप अपने कंप्यूटर को रीबूट करना चाहते हैं, तो आपके पास दो विकल्प हैं
(1) A Warm Boot                 (2)  A Cold Boot

(1) WARM BOOT (वार्म बूट) -
वार्मबूटिंग के लिए आपको कुछ की (Keys) एक साथ दबानी (press) होगी. कन्ट्रोल की (Control Key) आल्ट की (Alt key) तथा डैल की (DelKey) एक साथ दबानी होगी. जिससे आपकी स्क्रीन साफ हो जाएगी तथा कंप्यूटर रीस्टार्ट हो जायेगा.

(2) COLD BOOT (कोल्ड बूट) -
यदि वार्म बूट से आपकी समस्या पूरी तरह हल नही होती है, तो आपको कोल्ड बूट करना होगा, इसके लिए अपने कंप्यूटर के पॉवर स्विच (power switch) को ऑफ़ (off ) कर दीजिये तथा थोड़ी देर रुकिये तथा फिर power switch को ऑन (On) कर दीजिये




   

केश मेमोरी (Cache Memory) सबसे तेज़ क्यों होती है ?



                                                    केश मेमोरी ( Cache Memory )
केश मेमोरी (Cache Memory), वह मेमोरी है जो की मेमोरी प्रोसेसर स्पीड मिस मैच ( Mis Match ) को कम करने के लिए काम में आती है. केश मेमोरी CPU और मेन मेमोरी( Main Memory) के बीच की एक बहुत तेज़ और सूक्ष्म मेमोरी होती है जिसका एक्सेस टाइम CPU की प्रोसेसिंग स्पीड के पास में होता है. यह मेमोरी CPU और मेन मेमोरी के बीच में एक हाई स्पीड बफर (High Speed Buffer) की तरह काम करती है और यह प्रोसेसिंग समय के बहुत एक्टिव डाटा और निर्देशों को कुछ समय तक स्टोर करने के काम आती है क्योंकि केश मेमोरी , मेन मेमोरी (Main Memory) से ज्यादा तेज़ है. इसलिए डाटा और निर्देशों को केश में डालकर प्रोसेसिंग स्पीड को बढाया जा सकता है.

जैसा की हम जानते है की मेन मेमोरी काफी हद तक डिस्क प्रोसेसर स्पीड मिसमेच (Mis Match) को कम करती है क्योंकि CPU के द्वारा डाटा लेने की रफ्तार हाई स्पीड सेकेंडरी स्टोरेज से 100 गुना ज्यादा होती है फिर भी मेन मेमोरी के साथ प्रोसेसर मेमोरी और मेमोरी के बीच में एक से दस गुना स्पीड मिसमेच (Mis Match) हो जाती है जितनी स्पीड में CPU निर्देश को प्रोसेस कर सकता है इसका आशय है कि CPU की प्रोसेसिंग स्पीड उसके डाटा लेने की स्पीड से दस गुना ज्यादा है. इसलिए कई स्तिथियों में मेमोरी की धीमी गति के कारण प्रोसेस की कार्यक्षमता कम हो जाती है.

स्पष्ट रूप से , प्रोसेसर की कार्य क्षमता को मेमोरी प्रोसेसर मिसमेच (Mis Match) को कम करके बढाया जा सकता है जो की केश मेमोरी को काम लेकर किय जा सकता है.   






Friday, March 30, 2018

मॉडेम क्या होता है



                                                           मॉडेम (Modem)
मॉडूलेशन और डीमॉडूलेशन को मिलाकर व संक्षिप्त करके मॉडेम शब्द का निर्माण हुआ हो जो कंप्यूटर को टेलीफोन लाइन के द्वारा किसी अन्य कंप्यूटर को सूचना भेजने व लेने में मदद करता है.

यह एक ऐसी डिवाइस ( युक्ति ) है जिसका उपयोग सेंडिंग छोर पर डिजिटल सिग्नल को एनालॉग  सिग्नल में (एनालॉग) चैनल जैसे टेलीफोन लाइन पर भेजने के लिए) व रिसीविंग छोर पर पुनः डिजिटल में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है. यह दो पर्सनल कंप्यूटर को आपस में जोड़ने के लिए उपयोग की जाती है ताकि PCs टेलीफोन लाइन की सहायता से एक दूसरे से कम्यूनिकेट कर सके.

मॉडूलेशन  कंप्यूटर से प्राप्त डिजिटल सिग्नल को एनालॉग सिग्नल जिन्हें टेलेफोन सिस्टम प्राप्त करता है, में बदलने की क्रिया है. कनेक्शन के दूसरे छोर पर एक दूसरा मॉडेम इन सिग्नल को समझकर उन्हें पुनः डिजिटल सिग्नल में परिवर्तित करता है जिन्हें रिसीविंग कंप्यूटर समझ सके. एक मॉडेम कंप्यूटर में इंटरनली इनस्टॉल किया जा सकता है. इस परिस्थिति में यह इंटरनल मॉडेम कहलाता है. इसी प्रकार यह एक एक्सटर्नल डिवाइस भी हो सकता है जो की एक सीरियल केवल की मदद से कंप्यूटर के साथ जुड़ा होता है. नीचे दर्शाया गया चित्र दो कंप्यूटर के बीच मॉडेम की सहयता से कम्युनिकेशन या कनेक्शन बता रहा है. मॉडेम की स्पीड बॉड रेट या bps में मापी जाती है. डायलअप कनेक्टिविटी में मॉडेम की अधिकतम स्पीड 56 kbps हो सकती है.

                              मॉडेम की ऑपरेटिंग गति 9600 बड तक होती है ( जबकि टेलेफोन लाइन स्टैण्डर्ड हो ) तथा इसका उपयोग करने के लिए हमारे कंप्यूटर में इससे सम्बंधित उपयुक्त कम्युनिकेशन प्रोग्राम होना आवश्यक है. Govt. Polytechnic College Chhindwara